Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
नाहं तरङ्गः सलिलमहमित्येव युक्तितः ।
बुद्धं येन तरङ्गेन कुतस्तस्य तरङ्गता ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
अतीत पदार्थ का
संस्कारवश अन्तःकरण में स्मरण लोक में स्मृति कही जाती है । प्रजापति का तो कल्पादि में न विद्यमान
पदार्थ ही है, न भूत ही पदार्थ है और न कोई आगे होनेवाला पदार्थ ही है, जिसकी कि उन्हे स्मृति होगी,
यह भाव है