Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मणोऽस्य तरङ्गत्वमिवाभानं यतस्ततः ।
तरङ्गत्वातरङ्गत्वे ब्राहयौ शक्ती स्थितिं गते ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार चूँकि यह दृश्य आदि, मध्य ओर अन्तशून्य कूटस्थ परम ब्रह्म ही हे,
इसलिए स्मृति आदि कैसे हो सकती हैँ ?