Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
शरीरिणो यथा हस्ते हस्ततायां यथाग्रहः ।
सर्वात्मनस्तथा देहे देहतायां तथाग्रहः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए उसके बुद्धि आदि भी चित् से पथक् नहीं हैं, यह कहते हैं ।
केवल सत्तामात्रस्वरूप प्रजापति के बुद्धि आदि कहाँ से हो सकते हैं ? यदि पृथिवी आदि काही
अस्तित्व न हो तो अनन्त (असीम) आकाश मेँ धूलि कहाँ से होगी ?