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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

पादपस्य यथा पत्रे पत्रतायां यथाग्रहः । सर्वात्मनस्तथा वृक्षे वृक्षतायां तथाग्रहः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार उसके देह आदि भी नहीं हैं, ऐसा कहते हैं। उसके न देह, चित्त आदि हैं, न इन्द्र्यो हैँ ओर न वासनाएँ ही हैं । व्यवहाराभास के निर्वाह के लिए आपाततः(सरसरी दृष्टि से) उसके देहादि का अस्तित्व होने पर भी परमार्थरूप से देह आदि कुछ भी नहीं हैं