Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
वेदान्तार्हतसांख्यसौगतगुरुत्र्यक्षादिसूक्ता दृशो ब्रह्मैव स्फुरितं तथात्मकलया स्तादात्मनित्यं यतः ।
तेषां चात्मावेदोऽनुरूपमखिलं स्वर्गं फलं तद्भवत्यस्य ब्रह्मण ईदृगेव महिमा सर्वात्म यत्तद्वपुः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
अव स्मृति के कारणभूत संस्कार का खण्डन करने के लिए संस्कार का स्वरूप बतलाते हैं।
अन्तःकरणउपहितचिन्मात्र में बाह्यवस्तुस्वरूपभूत जो कुछ भी भासित होता है उसका यदि बारबार
व्यवहार द्वारा अभ्यास किया जाय तो उसके सदृश पदा्थोकि सादृश्य से वासित चित्त उसका संस्कार
कहा गया है