Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 44
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हिन्दी अर्थ
एकमात्र
स्वानुभवरूप स्वरूपवाला प्रमाता का स्वप्न अपृथिवीवाला है । भला बतलाइये तो सही वहाँ पर पृथिवी
आदि कहाँ से आ सकते हैं ?