Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 45
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हिन्दी अर्थ
इसलिए वैसे ही केवल शान्त चिदाकाशका ही अपने स्वरूप में
भान होता है । सृष्टि के आदि में ओर स्वप्नकाल में पृथिवी आदि की उत्पत्ति कहाँ से हो सकती
है ?