Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 174, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
अत्यन्तासंभवं दृश्यं यद्वै निर्वाणमासितम् ।
शुद्धबोधोदयं शान्तं तद्विद्धि परमं पदम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस सुवर्णमय अंगद ने (वाजूबन्द ने) अंगदत्व नहीं है
(सुवर्णं ही सत्य है विकारभूत अंगदत्व नहीं है) यह निश्चयपूर्वक जान लिया उसकी अंगदता कैसे हो
सकती है ? उसकी विशुद्ध सुवर्णता ही हे