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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verses 28–29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 174, verses 28–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 28,29

संस्कृत श्लोक

आलोककारिणात्यर्थं शास्त्रार्थेनैव शाम्यति । अमलेनाखिला भ्रान्तिः प्रकाशेनैव तामसी ॥ २८ ॥ सर्गसंहारसंस्थानां भासो भान्ति चिदम्बरे । स्पन्दनानीव मरुति द्रवत्वानीव वारिणि ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

सकल जगत्‌ का विराट के अंगरूप से वर्णन करते हैं। अवान्तर प्रलयरूपी ब्रह्मा की रात्रि विराट्रूपधारी परमात्मा के केशरूप से उदित हे, दिन ओर रात्रि काल और क्रिया नाम की उसके शरीर की सन्धिर्यो (जोड) हैं, अग्नि उसका मुँह है, द्युलोक मस्तक है, आकाश नाभि है, पृथिवी उसके चरण हैं, चन्द्र और सूर्य दो नेत्र हैं, दिशाएँ कान हैं, इस तरह से मन की कल्पना ही विराट के आकार से परिपुष्ट हुई है