Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 174, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
द्रव्यस्य हृद्येव चमत्कृतिर्निजा नभस्वतः स्पन्द इवानिशं यथा ।
यथा स्थिता सृष्टिरियं तथास्तिता लयं नभस्यन्तरनन्यरूपिणी ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार भली भाँति दृष्टिगोचर
हो रहा विस्तृत आकृति वास्तव मेँ शून्यात्मा अतएव हमारे मनोरथ से कल्पित पर्वत के तुल्य विराट
स्वप्न के आकार से स्थित है वास्तव नहीं है । यों उसकी हमारे स्वप्न से तुल्यता ही सिद्ध हुई, अतः
निष्प्रपचता ही परमार्थ हे, यह आशय है