Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 174, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 33
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न में प्राप्त हुआ नट अपने को ही
अपने से अतिरिक्त नाट्यदर्शक समाज से भरा स्वप्नदेश मानकर वहाँ पर अपना अभिनय स्वयं ही
देखता है वैसे ही अनुभव करनेवाला चिदात्मा ही अनुभवैकरस सत्य स्वरूप को भी माया के आवरण से
असत्-सा बनाकर परिच्छिन्न प्रपंचरूप से देखता है