Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 174, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 34
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हिन्दी अर्थ
इसी अर्थ में सकलवादियों के मत का अविरोध है और इसी से सबके वांछित फल की सिद्धि होती
है, ऐसा कहते हैं।
वेदान्तियों यानी शुद्ध ब्रह्मपरायणों, सर्वज्ञेश्वरपरायणों और उपासनानिरतों, दिगम्बरों, सांख्यों,
योगियों और बौद्धों को (सौत्रान्तिक, वैभाषिक, योगाचार और माध्यमिक चारों प्रकार के) गुरुजन
वेदव्यास, अरिहंत (जैन), कपिल,पतंजलि और बुद्ध एवं पशुपति या भैरव (आगमशारत्रविशेष के
निर्माता), वैष्णव, हैरण्यगर्भ आदि आगमशास्त्र के निर्माता विष्णु आदि द्वारा भलीभाँति वर्णित (अपने
अपने आगम शास्त्रों म प्रतिपादित) जो दृष्टिकोण हैं उनका रूप धारण कर हमारा अभिमत ब्रह्म ही तत्
तत् वासनारूप उनके स्वरूप से स्फुरित हुआ है और उन वादियों के आत्मसंवित् के (अपने अपने
निश्चय के) अनुरूप स्वर्ग (पारलौकिक सुखरूप) और ऐहलौकिक सुख, सकल फल वह ब्रह्म ही
बनता है, क्योकि तदात्मक ही फल तत्-तत् द्वारा वैसे वैसे हों यों आशा की जाती है। इस ब्रह्म की ऐसी
ही महिमा प्रसिद्ध है, क्योंकि मायाशबलरूप ब्रह्म सर्वात्मक है