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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 175, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । स्वप्नाभमाद्यं चिद्व्योम कारणं देहसंविदाम् । दृश्यान्यताऽसंभवतश्चिद्व्योम्नस्तत्कुतो वपुः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, चूँकि सृष्टि के आदि मेँ केवल चिति ही स्वप्न की संवित्‌ से जगत्‌ के रूप में अवभासित होती है यह सिद्ध किया जा चुका है अतः तीनों जगत्‌ ब्रह्म ही हे, ऐसा बोध होने पर कैवल्य सिद्ध हुआ, यह अर्थ है

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ तिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौहत्तरवाँ सर्ग प्रबोध (जागरण) द्वारा स्वप्न के मार्जन की भाँति ज्ञान द्वारा दृश्य का परिमार्जन करने पर अवशिष्ट रहे एक चिदात्मा का वर्णन ।