Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verses 4–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 174, verses 4–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 4-7
संस्कृत श्लोक
जाग्रति स्वप्ननगरं यादृक्तादृगिदं जगत् ।
परिज्ञातं भवेदत्र कथमास्था विवेकिनः ॥ ४ ॥
सर्गादौ सर्गसंवित्तेर्यथाभूतार्थवेदनात् ।
जाग्रति स्वाप्ननगरं यादृशं तादृशं जगत् ॥ ५ ॥
जाग्रति स्वप्ननगरवासना विविधा यथा ।
सत्या अपि न सत्यास्ता जाग्रत्यो वासनास्तथा ॥ ६ ॥
अन्यथोपप्रपद्येह कल्प्यते यदि कारणम् ।
तत्किं नेदीयसी नात्र भ्रान्तता कल्प्यते तथा ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
आकाश का शून्य में शून्यताहन्ता में आग्रह है वैसे ही सर्वात्मा का द्रव्य में (मणि, मोती, सुवर्णं आदि
धन में) द्रव्यता में (प्रयत्न से उपार्जनीयरूप भव्यता में) आग्रह हे । जेसे स्वप्नभोक्ता का अरूप चित्तरूपी
उपादान से उत्पन्न होने के कारण अरूप होने योग्य स्वप्ननगर की साकारता में आग्रह है वैसे ही
सर्वात्माका स्वप्न, जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं की साकारता में आग्रह है । पर्वतराज में, नगर में
विद्यमान पत्थर, वृक्ष, जल आदि में वह ऐसा प्रसिद्ध आग्रह है वैसे ही पर्वत आदि के अभिमानी सर्वात्मा
का पर्वतता, नगरता आदि में आग्रह हे