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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 174, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

यथा स्वप्नसुषुप्तात्म निद्रारूपकमेव खम् । दृश्यादृश्यांशमेकात्मरूपं चिन्नभसस्तथा ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुवर, सकल देह की अहन्ता से प्रसिद्धि समान होने पर भी जैसे देही का हस्त में ही हस्तत्वाहंभाव में आग्रह है वैसे ही सर्वात्मा चित्‌ का देह में देहत्वाहंभाव में आग्रह है । जैसे वृक्ष का पत्रमे ही पत्रत्वाहन्ता में आग्रह है वैसे ही सर्वात्मा चित्‌ का वृक्ष में वृक्षताहन्ता में आग्रह है