Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 174, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
सर्गादौ स्वप्नसंवित्त्या चिदेवाभाति केवला ।
जगदित्यवभासेव ब्रह्मैवातो जगत्त्रयम् ॥ १ ॥
सर्गास्तरङ्गा ब्रह्माब्धेस्तेषु संवेदनं द्रवः ।
सर्गान्तरं सुखाद्यात्म द्वैतैक्यादीतरत्कुतः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, यदि स्वप्रकाश चित् का चमत्कार ही जगत् है तो तुल्य होने के
कारण चित् का सब जगह अहन्ताग्रह उचित है फिर सर्वानुभवरूपसर्वात्मक असीम आत्मतत्त्व का देह
में ही यह अहन्ताग्रह है अन्यत्र नहीं यह नियम केसे ? यह पहला प्रश्न हुआ । इसी प्रकार चित् का
अचिद्रूप पाषाण, काठ आदि के भाव में आग्रह कैसे? क्योकि चिद्भाव का त्याग नहीं किया जा सकता
और अचिद्रूप का स्वीकार नहीं किया जा सकता यह दूसरा प्रश्न हे । इसी प्रकार चित् ही सर्वात्मक है
ऐसी अवस्था में यह पाषाण, काठ आदि अचिद्ररग नास्तित्व को (असत्ता के) कैसे प्राप्त होता हे क्योकि
चित् का अपलाप किया नहीं जा सकता । यह तीसरा प्रश्न है । इसी प्रकार सर्वात्मक चिद् विपरीत
अचिद्रूप पाषाण, काठ आदि है केसे ? जिससे कि वह सर्वात्मक हो । यह चौथा प्रश्न हे
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ बहतर्व सर्ग समाप्त एक सौ तिहत्तरवां सर्ग जैसे चित् का भी देहादि जड़ पदार्थो में अहन्ता का आग्रह है ओर जैसे उसकी सर्वात्मकता है, उसका प्रतिपादन ।