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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verses 47–48

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verses 47–48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 47,48

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जगद्रूप दृश्य न स्मृतिरूप है ओर न साकार ही है, क्योकि पृथिवी आदि का अत्यन्त असंभव है । इसी तरह वह न भ्रान्ति है और न विवर्त, परिणाम आदि ही है । एकमात्र ब्रह्मरूप ही है । चारों ओर सुन्दर जगतूस्वरूप ब्रह्म का ही स्फुरण है ओर वह स्फुरण और अस्फुरण में यानी सृष्टि ओर प्रलयकाल में निज आत्मा में (अविकृतस्वभाव में) स्थित है वह एकरूप ही दुश्यवत्‌ स्फुरित होकर भी निर्मल आकाश ही हे, किन्तु अज्ञानियों की दृष्टि में अनादिकाल से प्रलय और सृष्टि के उदयरूप से उदित है