Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verses 13–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 175, verses 13–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 13-15
संस्कृत श्लोक
अन्यथानुपपत्त्यार्थकारणाभावतः स्वतः ।
सर्गादावेव स्वात्मैव दृश्यं चिद्व्योम पश्यति ॥ १३ ॥
स्वप्नवत्तच्च निर्धर्म मनागपि न भिद्यते ।
तस्माच्चिद्व्योम चिद्व्योम शून्यत्वं गगनादिवत् ॥ १४ ॥
यदैव तत्परं ब्रह्म सर्वरूपविवर्जितम् ।
तदेवैकं तथारूपमेवं सर्वतया स्थितम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए वादियो के अभिमत पक्षों मे मोक्षअभावरूप दोष से छुटकारा न मिलने के कारण जगत्
केवल श्रान्तिमात्र है निरतिशयानन्द सच्चिदेकरस ही आत्मा है इस तत्वज्ञान से भ्रान्तिजन्य
अज्ञान आवरण के विनाश से श्रान्तिक्षय होने पर परिशेष रहनेवाला परमपुरुषार्थ है यह हमारा पक्ष ही
सबके लिए शरणरूप है, यों उपसंहार करते हैं।
इसलिए सम्यक् ज्ञान से विवेकी पुरुष की दृष्टि में सृष्टि का अत्यन्त असंभव होने से जगत्
भ्रान्तिमात्र हे । जो जीवन्मुक्तता का उदय है वही निर्विकल्प समाधि है वही वेदान्तशास्त्र में अनन्त
निर्वाण कहा जाता हे । यथास्थित, विक्षोभ रहित, सर्वप्रकाशक वह आसन (स्थिति) अनन्त सुषुप्त
नामक है,वही तुरीय कहा गया है वही निर्वाण कहा गया है और वही मोक्ष कहा गया हे