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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 175, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

नेह पृथ्व्यादि नो देहो न चैवान्यास्ति दृश्यता । जगत्तया केवलं खं मनः कचकचायते ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

उसकी प्राप्ति में मोक्षोपाय नाम का यह ग्रन्थ ही उपाय है, ऐसा कहते है । उत्पन्नमति (बुद्धिमान्‌) पुरुष को वह शुद्धबोधरूप उत्तम ध्यान पदपदार्थज्ञाता को बोधित करनेवाले इस शास्त्र से प्राप्त होता है