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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 175, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

असदेवानुभूरित्थमेवेदं भासते जगत् । स्वप्नाङ्गनासङ्ग इव शान्तं चिद्व्योम केवलम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न ओर सुषुप्ति केवल निद्रारूप ही हैं वैसे ही दृश्य और अदृश्य स्वरूप आकाश चिदाकाश का ही एक रूप हे । जैसे स्वप्न में सुषुप्ति ओर स्वप्न में भेद का आभास होने पर भी दोनों में एकमात्र निद्रारूपता का व्याघात नहीं होता वैसे ही विदेहमुक्ति ओर जीवन्मुक्ति में भेद का आभास होने पर भी उन दोनों मे सुखेकरसता का व्याघात नहीं होता, यह भाव है