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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 175, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

एवंनामास्ति चिद्धातुरनादिनिधनोऽमलः । शून्यात्मैवाच्छरूपोऽपि जगदित्यवभाति यः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जाग्रत्‌ में जैसे स्वप्ननगर है वैसे ही यथार्थतः परिज्ञात यह जगत्‌ है इसमें विवेकी पुरुष की आस्था कैसे हो सकती है ?