Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 175, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
मलस्त्वेषोऽपरिज्ञातः परिज्ञातः परं भवेत् ।
कुतः किल परे व्योमन्यनादिनिधने मलः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जाग्रत् में
स्वप्ननगर का जैसे बाध हो जाता हे वैसे ही सृष्टि के आरम्भ में सृष्टिसंवित् के यथार्थतः ज्ञात होने के
कारण जगत् भी बाधित हो जाता है