Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
अस्ति खे खादनन्यात्मा चिद्व्योमपरमाणुकः ।
शून्यरूपमिवाकाशे शुद्धः स्पन्द इवानिले ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, विचारदृष्टि से तो कुछ भी स्फुरित नहीं होता है, क्योंकि यह महाचिति
अत्यन्त स्वच्छ कही गई है, चिन्मात्ररूप जो अद्वितीय ही ब्रह्म है, केवल उसकी कल्पना ही इस प्रकार
(जगत्रूप से) निज आत्मा में विस्तृत है