Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
शुभं ममेदमाख्यानं श्रृणु श्रवणभूषणम् ।
ब्रह्माण्डपिण्ड इत्युक्तं ब्रह्माण्डाख्यानमेव च ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
स्वच्छ से भी अत्यन्त स्वच्छ जो यह महाचिति है वह
स्वयं ही जगत् के रूप से स्फुरित होती हे इसीका नाम सृष्टि है अतः जगत् चिदाकाश ही है उससे भिन्न
नहीं है