Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verses 8–9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
पुरा पृष्टो मया ब्रह्मा जगज्जालमिदं कियत् ।
क्व वा भातीति वद मे ब्रह्मोवाच ततः स माम् ॥ ८ ॥
श्रीब्रह्मोवाच ।
ब्रह्मैवेदं मुने सर्वं जगदित्यवभासते ।
सतामनन्तं सत्त्वेन जगत्त्वेनासतामपि ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
जल में आवर्त की (भँवर की)
तरह और वायु में स्पन्दन की तरह चिदाकाश में बिना भीत का जो जगद्भान होता है, उसके अन्तर
जीवभाव से उसमें प्रवेशकर मैं हिरण्यगर्भ भुवनम्रष्टा हूँ यों अपने ऐश्वर्य का बखान करनेवाले परमात्मा
ने ही स्वयं जगद्भान की ही बुद्धि आदि, पृथिवी आदि नामरूपव्याकरणरूप सत्असत्मय मूर्तअमूर्तप्रचुर
या सत्यानृतमिथुनीकरणरूप कल्पना की