Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
ब्रह्माण्डलक्षनिचयाः परमात्मनीति नित्यं स्थिता निपुणमन्यवदप्यनन्ये ।
वारिण्यवारितविसारितरङ्गवेगाल्लोलं स्थिताम्बुपरमाणुचया यथैते ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
वह प्रबुद्ध (ज्ञानवान्) पुरुषश्रेष्ठ निश्चल होकर अनन्त अपार चिन्मात्ररूप परम इष्ट
(परमप्रेमास्पद निरतिशयानन्दघनतारूप) हो जाता है। अथवा ज्ञानरूप अग्नि में परिपाकवश दृढ होने
से ब्रह्मरूप ईट स्वयं बन जाता है, ऐसा अर्थ हे