Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 26
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार मुक्ति को प्राप्त हुए पुरूषश्रष्ठ के फिर कालान्तर में सृष्टि आदि से बन्धन-प्रसंग का
वारण करने के लिए सृष्टि की अज्ञानपूर्वकता दिखलाते है ।
जैसे जलमें द्रव से अबुद्धिपूर्वक ही (अज्ञानपूर्वक ही) आवर्त, बुद्बुद् आदि होते हे वैसे ही अविद्यावृत
ब्रह्मा ने अज्ञानपूर्वक ही चित्त, बुद्धि आदि जड़ पदार्थो का निर्माण किया हे । अविद्यावृत चैतन्य ही जलादि
बनकर आवर्तं आदि विकल्पों का भाजन होता है, अतएव जलादि की दृष्टान्तता हे