Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 30
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हिन्दी अर्थ
अविद्यावृत ब्रह्म नेत्र के समान उन्मेष निमेषरूप है
अथवा वायु के समान स्पन्दअस्पन्दरूप है । उसका जैसा प्रलयरूप निमेष है वैसा ही सर्गात्मक
उन्मेष जगत् है