Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verses 46–58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verses 46–58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 46-58
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हिन्दी अर्थ
मेरे द्वारा निर्दिष्ट इस उपाय से (युक्ति से) यदि जगत् का भलीभाँति
अवलोकन कीजिये तो यह सब आपको सत्तामात्र ही प्रतीत होगा । यह दृग (चित्) ही है इस चित्
में द्वित्व, एकत्व की कल्पना कोई नहीं है । जिनकी ज्ञानदृष्टि में दृश्य, सत्, असत्, मूर्त, अमूर्त सब
कुछ ब्रह्म ही है, उनकी दृष्टि में यहाँ अथवा कहीं न कर्ता अथवा भोक्ता जीव ही हैं और न उनका
अभाव ही है, क्योकि उन्हींका ब्रह्मरूप से शेष रहता है। जैसे अज्ञानी पथिकों के चोरों के सन्देह,
भ्रान्ति आदि के योग्य वनमार्ग मेँ स्थाणु ही चोर आदि के रूप से स्थित होता है वैसे ही आदि अन्त
विहीन सर्वतः शान्त जगतपर्यायवाला ब्रह्मैकघन (चिन्मात्रघन) यह ब्रह्म ही इस प्रकार (जगद्रूप से)
आत्मा में स्थित है । जो ही बुद्धि समष्टि हिरण्यगर्भं आदिरूप जगत् है उसी को आप निरंजन
(निर्विकार) ब्रह्म जानिये जैसे कि जो ही प्रशान्त आकाश है वही शून्य है । जैसे आकाश में केशों
का वर्तुलाकार गोला, नीलता आदि, जो सद्असद्रूप हैं, आकाश से भिन्न से प्रतीत होते हैं, वैसे ही
परम ब्रह्म में सद्असदात्मक बुद्धि आदि भिन्न से प्रतीत होते हैँ । जैसे आकाश मेँ घट, पट आदि
के सब अभाव आकाश से अनन्य हैँ, वैसे ही सर्वसामान्यसत्तारूप ब्रह्म में बुद्धि आदि, देह आदि
अनुभव आदि अनेकरूप प्रतीत होने पर भी ब्रह्म से अभिन्न ही हैं । एकमात्र निद्रारूप सुषुप्ति से
स्वप्न में प्रवेश कर रहे स्वप्न-सृष्टि में स्थित जीवात्मा का न तो द्वित्वरूप से निर्वचन होता है और
न एकत्वरूप से ही होता है क्योकि वहाँ व्यावर्त्य कोई प्रसिद्ध नहीं हे वैसे ही एकमात्र निद्रारूप प्रलय
से सृष्टि में प्रवेश कर रहे अज्ञ दृष्टि से सर्गस्थ भी ब्रह्म का द्वित्वरूप से अथवा एकत्व रूप से निर्वचन
नहीं हो सकता । हे श्रीरामजी, महाचेतन की यह अपनी निर्मल कान्ति अथवा अविद्या ही जगत् के
रूप से स्फुरित होती है । वास्तव में तो निर्मल छाया इस प्रकार स्थित है कुछ भी स्फुरित नहीं होती
हे । चिदाकाश में चिदाकाशरूप ही यथास्थित (ज्यों -का- त्यो) निज स्वच्छ विग्रह चेत्य-सा दृश्य-
सा प्रतीत होता है जैसे कि स्वप्नो मेँ यथास्थित चिदात्मा ही स्वप्न पदार्थो के रूप से स्फुरित होता
हे । हजारों वादियों द्वारा भी सद् वस्तु से अतिरिक्त का उपपादन न हो सकने तथा सत्यकारण का
अभाव होने से चिद्व्योम स्वयं अपने को दृश्यरूप से देखता है, यही पक्ष सिद्ध हुआ । सृष्टि के
आरम्भ में निराकार चिदाकाश परमात्मा का ही दृश्य के रूप में भान होता है ओर वह भान स्वप्न,
संकल्प ओर मिथ्याज्ञान में हुए भ्रम के तुल्य भ्रम ही है । दृश्य स्वप्न के समान सकल धर्मशून्य
चिदाकाश ही हे, क्योकि उसमें तनिक भी धर्म का अस्तित्व नहीं है । वस्तुभूत (परमार्थभूत)
चिदाकाशका विकारी भी तथा धर्मवान् भी आकार अविद्यारूप मल से प्रतीत होता हे । वास्तव में
उसमें आकार, विकार और धर्म नहीं हैं । स्वप्ननगर के तुल्य दृश्य प्रतीतितः साकार होता हुआ भी
वास्तव में निराकार है ओर प्रतीतितः धर्मवान् होता हुआ भी निर्धर्मक हे । अधिष्ठानरूप सन्मात्र से
अभिन्न भी वह अज्ञजनों की दृष्टि से इस प्रकार जगत् के आकार से निरन्तर ही स्थित
है