Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 61
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हिन्दी अर्थ
स्वप्न में दृश्य का सबको अनुभव होता हे । स्वप्न में आत्मा ही नगर आदि के रूप में भासता हे ।
शंका : स्वप्नकाल में सत्य नगरादि का जीव द्वारा निर्माण हो, क्योकि “अथ रथान् रथयोगान्यथः
सृजते स हि कर्ता (स्वप्नकाल में जीव रथो की तथा रथयोग्य मार्गो की सृष्टि करता है) ऐसी श्रुति है ।
समाधान : स्वप्न में जीव द्वारा सत्य नगर आदि की रचना नहीं होती है, क्योकि न तत्र रथा
रथयोगा पन्थानो भवन्ति“ (न वहाँ रथ होते है ओर न रथयोग्य मार्ग होते है) (मायामात्रं तु
कात्यसेर्येनानमिव्यक्तस्वरूपत्वात् (स्वप्न की सृष्टि शुक्ति रजत, रज्जुसर्प आदि के समान मायामात्र
है, क्योकि उसका स्वरूप देश, काल आदि सम्पूर्ण धर्मो से अभिव्यक्त नहीं होता) इत्यादि श्रुति ओर
सूत्रों ने स्वप्न में सृष्टि का निषेध किया है ओर उसे मायामात्र कहा है