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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 68

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verse 68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 68

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

प्रक्रत में दृश्यभ्रम की निवृत्ति का उपयोगी कौन अभ्यास करना चाहिये, यह बतलाते हैं। तत्त्वज्ञानी गुरु को सेवा आदि द्वारा प्रसन्न करके उनके द्वारा इस मोक्षउपायभूत शास्त्र का व्याख्यान कराकर जो उसके श्रवण का अभ्यास है, उसके बिना दृश्य की निवृत्ति के लिए न कोई दूसरा मार्ग हुआ है और न होगा