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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 69

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verse 69 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 69

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

यदि कोई यह शंका करे कि इस शास्त्र के अभ्यास से क्या करना है, योगशास्त्र में प्रसिद्ध चित्त के निरोध से ही दृश्यविलोपरूप इष्ट सिद्धि हो जायेगी ? तो इस पर कहते हैं। हाँ ऐसा होता यदि चित्त का निरोध शक्तिसाध्य होता । चित्त-निरोध का ही संभव नहीं है । चित्त का स्वरूप संसार से अविनाभावी (पृथक्‌ न होनेवाले) है, अतः जाग्रत्‌ और स्वप्न में जीवित अथवा सुषुप्ति में लय होने के कारण मरे हुए चित्त का प्रयत्नपूर्वक निरोध करने पर भी उसका संसार से निरोध नहीं हो सकता है, किन्तु इस शास्त्र के अभ्यास के अधीन बोध होने से ही बाधित होकर यह संसार को नहीं देखता है, इसलिए इस शास्त्र का अभ्यास ही दृश्यनिवृत्ति का उपाय है, यह भाव हे