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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 70

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verse 70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 70

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जैसे चित्त सदा ही संसार से अविनाभावी है वैसे ही दृश्यरूप संसार भी चित्त और शरीर दोनों से अविनाभावी । वे दृश्य और शरीर इस शास्त्र के अभ्यास से प्रतिबन्ध न होने पर इसी जन्म में तत्त्वबोध होने पर निवृत्त हो जाते हैँ, प्रतिबन्ध रहने पर अन्य जन्म में प्रतिबन्ध का नाश होने पर बोध होने से निवृत्त होते हे । इस विषय में भगवान्‌ वेदव्यासजी का सूत्र है - ऐहिकमप्रस्तुतप्रतिबन्धेत दर्शनात्‌" (प्रतिबन्ध का अभाव होने पर इस जन्म में विद्या की उत्पत्ति हो सकती है ओर प्रतिबन्ध होने पर अन्य जन्म में भी होती है इसी जन्म में विद्या उत्पन्न हो ऐसा नियम नही है, क्योकि श्रुतियों में ऐसा देखा जाता है