Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, Verses 11–12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 177, verses 11–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 177 · श्लोक 11,12
संस्कृत श्लोक
नेह शून्यं न वा शून्यं न सन्नासन्न मध्यता ।
विद्यते न महाशून्ये न नेति न न नेति च ॥ ११ ॥
इदं न किंचित्किंचिद्वा यन्नामास्त्यथ नास्ति वा ।
सर्वं ब्रह्मैव तद्विद्धि यत्तथैवातथैव तत् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश में शून्यत्व के समान ओर वायु के शुद्ध स्पन्दन के तुल्य आकाश से अभिन्नस्वरूप चिदाकाश
परमाणु है। उसने (चिदाकाश-परमाणु ने) अपने ता्विकस्वरूप के अदर्शनरूप निद्रावश स्वप्न की
तरह अपने आत्मा में अपने से समष्टिजीवत्व वैसे ही देखा जैसे आकाश अपने में स्व से अभिन्न
शून्यरूप देखता है या जैसे वायु अपने में स्पन्दन देखता है