Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, Verses 13–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 177, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 177 · श्लोक 13,14
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
अतज्ज्ञविषये ब्रह्मन्कार्ये कारणसंभवे ।
किमकारणतात्म स्यात्कथं वेति वद प्रभो ॥ १३ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अतज्ज्ञो नाम नास्त्येव तावत्तज्ज्ञजनं प्रति ।
असतो व्योमवृक्षस्य विचारः कीदृशस्ततः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त अपनी अविकारिता,
असंगता, पूर्णता ओर सूक्ष्मता का त्याग न कर रहे उस जीव ने आकाशरूप अहंकाररूप से अपना
स्वरूप देखा । उस अहंकाररूप ने अपने में मैं बुद्धि हूँ" यों अपने को बुद्धिरूप से देखा । वह बुद्धि एक
निश्चय निर्माणमयी (निश्चयात्मिका) असत् पदार्थो की भ्रान्ति उत्पन्न करने के कारण माया की
अनुरूपिणी है