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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, Verses 16–18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 177, verses 16–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 177 · श्लोक 16-18

संस्कृत श्लोक

अतज्ज्ञत्वं च बोधेऽन्तरवभाति तदङ्गता । गते स्वप्नसुषुप्तेऽन्तरिव निद्रात्म केवलम् ॥ १६ ॥ तथाप्यभ्युपगम्यापि मूर्खनिश्चय उच्यते । मयेदमणु सर्वात्म यस्माद्ब्रह्म निरामयम् ॥ १७ ॥ सन्त्यकारणका एव सन्ति कारणजास्तथा । भावाः संविद्यथा यस्मात्कल्प्यते लभ्यते तथा ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर उक्त निराकार मन ने स्वप्न में देहवर्ती पाँच ज्ञानेन्द्रियों को वैसे ही देखा जैसे कि अज्ञानावृत जीव -चैतन्यस्वप्न में निराकार आत्मचैतन्य को घनाकार स्वप्नपर्वत के रूप में देखता है। उस मन देह चिदाकाश परमाणु ने इस प्रकार समष्टिरूप होकर भित्तिशून्य (भेदशून्य) होते हुए भी भित्तियों से पूर्ण (भेदपूर्ण) विस्तृत त्रिभुवनस्वरूपविराट शरीर को देखा, जो अनेकों भूतों से वेष्टित, विविध स्थावर-जंगमजीव से युक्त, कल्पना ओर काल से व्याप्त तथा परस्पर अनेकों के संग की कल्पना करनेवाला हे