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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 177, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 177 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

कल्पनाकल्पनात्मैकं तच्च ब्रह्म स्वभावतः । कल्पनात्मेदृशं जन्तुर्यथा केशनखादिमान् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

ही अतीत, अनागत आदि सकल सृष्टियों के आदि में चिन्मात्र का ही जगद्रूप से भान होता है, केवल इतना अंश ही उनका उपयोगी है अन्य उनकी अनन्त विचित्रता प्रकृत के उपयोगी नहीं हे