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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 177, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 177 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

अकारणपदार्थत्वं सकारणपदार्थता । ब्रह्मणि द्वयमप्यस्ति सर्वशक्त्यात्म तद्यतः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

उनकी अनन्त विचित्रता क्यों प्रकृतोपयोगी नहीं है ऐसा यदि प्रश्न हो तो असंख्य होने के कारण उनकी विचित्रता की इयत्ता का शास्त्र में वर्णन करना दुष्कर है, इस आशय से कहते हैँ । आकाश में परमाणु परमाणु में असंख्य जगत्‌ हैं, अतः उनके उन अनन्य व्यवहारो का पूर्णरूप से वर्णन करने की किसमें क्षमता हे ?