Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
बहिर्भस्त्रामयस्कारः संकोचनविकासनैः ।
योजयत्यान्तरं नाडीं कश्चालयति चालकः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
इस ब्रह्म में शून्यता और अशून्यता दोनों का अभाव है,
क्योकि अशून्यता शून्य की अपेक्षा से होती हैँ अतएव न शून्य है, न अशून्य है, न सत् है, न असत् है
और न सत्असत् है। महाशून्य में “ननेति ननेति” यों कथन होता है