Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
शतं कथं भवेदेकं कथमेकं शतं भवेत् ।
कथं स चेतना एते काष्ठलोष्टोपलादयः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
सकल जगत् की ब्रह्मैकघनता से शून्यता है, शून्यैकरसता से शून्यता नहीं है, ऐसा कहते हैं।
जो कुछ नहीं है, शून्य है, अथवा कुछ है; जो है अथवा नहीं है ऐसे इस जगत् को आप ब्रह्म ही
जानिये,क्योंकि वह ब्रह्म अध्यारोप में सबसे अनुगत होने के कारण वैसा ही है और अपवाद में सबसे
व्यावृत्त होने के कारण वैसा है ही नहीं