Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
वाय्वन्त्रादिशरीरस्थं सर्वं सप्रतिघं मुने ।
कथमप्रतिघा संविच्चालयेदिति मे वद ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञानी के प्रति अज्ञानी क्यो नहीं है ? इस प्रश्न पर कहते हैं।
तत्त्वज्ञानी लोग एक बोधमय, शान्त विज्ञानघनरूपी हैं, क्योकि "तद्यथासेन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः
कृत्स्नो रसघन एवं वा अरे अयमात्मा विज्ञानघन एव प्रज्ञानघन एव” (जैसे नमक के ढेले का न कुछ
बाहर है न भीतर है वह सारा का सारा रसघन हे वैसे ही यह आत्मा विज्ञानघन ही हे प्रज्ञानघन ही हे)
ऐसी श्रुति हे । इसलिए उनकी असत् पदार्थ के विषय में विचारणा कैसे संभव है ?