Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अन्तःसंवेदनं नाम चालयत्यान्त्रवेष्टनम् ।
बहिर्भस्त्रामयस्कार इव लोकेऽनुचेष्टनम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हाँ, ऐसा होता, यदि ब्रह्म से भिन्न प्रधान, परमाणु आदि की कल्पना करनेवाला कोई अज्ञानी सिद
होता जब ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेदह ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सर्वमभवत्* इस श्रुति द्वारा
प्रदर्शित रीति से ब्रह्म ही अपने स्वरूप के अज्ञान से अज्ञ होता है उसी के तत्त्वज्ञान में उपयोगी शास्त्र तब
अध्यारोप और अपवादरूप युक्ति से ही तत्त्वज्ञान में उपयुक्त होता है न कि प्रधान, परमाणु आदि की
कल्पना से यों दोनों मे विषमता है इस आशय से श्रीवसिष्ठजी श्रीरामजी के प्रश्न का समाधान करते हैं ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : “वत्स, तत्त्वज्ञानी जनकी दृष्टि में अज्ञानी कोई अतिरिक्त हे ही नहीं। ऐसी
स्थिति में असत् आकाश वृक्ष के विषय में विचार करना कैसा 2