Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
सप्रतिघाप्रतिघयोर्मिथो यदि पदार्थयोः ।
वेल्लनं स्यात्तदिच्छैव कर्तृकर्मेन्द्रियैः क्व किम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि अज्ञानादि जगत की अधिष्ठानतारूप सवत्मिकता ब्रह्म का लक्षण हो तो ज्ञान से उसकी
निवृत्ति होने पर यह अब्रह्म ही होगा, ऐसी आशंका उठने पर कहते है ।
यद्यपि अज्ञानादि जगत की अधिष्ठानतारूप सर्वात्मकता ही ब्रह्म का लक्षण है तथापि मूर्ख जनता
को बोधित करने के लिए मूर्ख बुद्धि का अनुसरण कर शुद्ध ब्रह्म को समझाने के लिए मैंने यह ब्रह्म का
तटस्थलक्षणरूप अज्ञनिश्चय कहा है । ब्रह्म का शुद्ध निरामय आनन्देकरस स्वरूप स्वरूपलक्षण तो
अतिसूक्ष्म होने से अज्ञानियों की समझ में नहीं आ सकता है