Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
सर्वसंदेहवृक्षाणां मूलकाषमिदं वचः ।
सर्वैकतानुभूत्यर्थं श्रृणु श्रवणभूषणम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार के स्वप्न, गन्धर्वनगर, मरुमरीचिका सदृश जगत् में
सत्यता सिद्ध करने के आग्रह से वैशेषिक आदि "मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्” इत्यादि
श्रुतियों में प्रसिद्ध मायाउपहित ब्रह्म से भिन्न तटस्थ ईश्वर, प्रधान, परमाणु कुछ कारण की कल्पना
करते हैं पर वह प्रत्यक्ष श्रुति ओर विद्वानों के अनुभव से विरुद्ध होने ओर वेदान्त शास्त्र मेँ विविध
युक्तियों से निराकृत होने के कारण कडवा, सृष्टि करनेवाले ईश्वर अथवा भोग करनेवाले जीव का
पुरुषार्थप्रद न होने से निरर्थक, अतएव ज्ञानियों का अहृदयंगम (अरुचिकर) वृथा कण्ठशोषण
करनेवाले वागूजाल (वाग्विलासः) ही है