Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
अन्तः स्वयं योगिना वा यथैतदनुभूयते ।
अमूर्तस्यैव मूर्तेन वेल्लनं तद्वदाशु मे ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वद्ृष्टि से सदा अखण्ड अद्वितीय ब्रह्म ही है कदाचित् भी अणुमात्र भी इसमें हेरफेर नहीं है
इसलिए सृष्टि के कारण का (परमाणु आदि का) कोई निरूपण नहीं कर सकता, ऐसा कहते है ।
सकल कारणों की निवृत्ति होने पर सकल तत्त्ववेत्ता ओं की दृष्टि में सृष्टि का कोई कारण नहीं
है । इससे सृष्टि अकारण है