Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
शुद्धं संविन्मयं सर्वं शान्तमप्रतिघात्मकम् ।
पदार्थजातं पृथ्व्यादि स्वप्नसंकल्पयोरिव ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी बात का विस्तृतिकरण करते हैं।
अप्रबुद्ध (सुप्त) पुरुष के स्वप्न के पृथिवी आदि पदार्थों के अनुभव में क्या कारण है ? चित्स्वभाव
के सिवा स्वाप्न पदार्थ क्या है ? कहिये