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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verses 23–24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verses 23–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 23,24

संस्कृत श्लोक

आदावन्ते च नास्तीदं कारणाभावतोऽखिलम् । भ्रान्त्यात्मा वर्तमानापि भाति चित्स्वप्नगा यथा ॥ २३ ॥ द्यौः क्षमा वायुराकाशं पर्वताः सरितो दिशः । महता कारणौघेन बोधमप्रतिघं विदुः ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वाप्न पदार्थ जब तक अज्ञात रहता है यानी यह स्वप्न है वास्तव नहीं है यों ज्ञात नहीं होता है तभी तक महामोहराशि का प्रदान करता है जब यह स्वप्न है यों ज्ञात हो जाता है तब मोह नहीं करता वैसे ही सर्ग भी जब तक उसकी वास्तविकता का ज्ञान नहीं होता तभी तक मोहप्रद है उनकी असत्यता का ज्ञान होने पर मोह नहीं करते हैं । शुष्क तर्क के दुराग्रह से अनुभव में आरूढ न होनेवाला जो यत्‌ किंचित्‌ कारण (प्रधान, परमाणु आदि) कल्पित होता है, वह मूर्खतावश एकमात्र दूराग्रह ही है