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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

अन्तःकरणभूतादि मृत्काष्ठदृषदादि वा । सर्वं शून्यमशून्यं च चेतनं विद्धि नेतरत् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

अग्नि की उष्णता, जल की शीतलता, सकल तेजो की प्रकाशता जैसे स्वभाव है वैसे ही ज्ञात ब्रह्म का स्वभाव ही सब पदार्थों का कारण है। भाव यह कि यदि कारण अपेक्षित है तो अज्ञानउपहित आत्मा का स्वभाव ही कारण हो