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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

तत्रैवमैन्दवाख्यानं श्रृणु श्रवणभूषणम् । मया च पूर्वमुक्तं तत्किंचान्यदभिवर्ण्यते ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

मनोरथ से कल्पित नगर की तरह ध्याता के भेद से व्यवस्थित आकारवाला होने के कारण भी इसका सर्वसाधारण एक कारण नहीं कहा जा सकता है, इस आशय से कहते हैं। सैकड़ों ध्यानकर्ताओं द्वारा प्राप्त हुए एक ध्येय का (ध्यानयोग्य का) क्या कारण है ओर गन्धर्वनगर, स्वप्नपुर और भित्तियों में क्या कारण है ?