Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
तथापि वर्तमानोक्तप्रश्नबोधाय तच्छृणु ।
यथेदं सर्वमन्द्यादि चिदित्येव तु भोत्स्यते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
धर्म-अधर्म तो अमूर्त होने के कारण ही मूर्त देह आदि के उपादान कारण नहीं हो सकते हैं यों
कर्ममीमांसकों के पक्ष का भी निराकरण करते हैं।
अमूर्त (निराकार) होने के कारण धर्म आदि परलोक में मूर्त साकार देह के कारण नहीं हैं फिर स्वर्ग
आदि का भोग करनेवाले शरीर का क्या कारण होगा ?